यह कहानी एक औरत की है। एक ऐसी औरत जो अपनी जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर टूटे दिल और थकी हड्डियों के साथ अपने हक की जंग लड़ने निकली। लेकिन ये कहानी सिर्फ उस औरत की नहीं है, ये उस तूफान की दास्तान है जिसने हिंदुस्तान की नींव को हिला कर रख दिया। इस औरत को लेकर एक ऐसा फैसला हुआ जिसने सियासत के नक्शे को पलट दिया, मंदिर का ताला खुलवा दिया, इस मुल्क को दो धड़ों में बांट दिया। यह कहानी शाहबानों की है। यह कहानी भारत की है।
Table of Contents
Toggleशाहबानों बनाम मोहम्मद अहमद खान
40 साल पहले साल 1985 में एक ऐसा केस आया जिसने राजनीतिक भूकंप ला दिया। ऐसा भूकंप जिसकी लपटें आज भी सुनी जा रही हैं। वो ताला खुलना या दंगे होना या वोटों का सफाया होना सब कुछ उस एक औरत की पुकार की देन रहा। इंदौर की वो 62 साल की विधवा जो पांच बच्चों की मां रही शाहबानो। उसकी आंसुओं से भरी आंखें, उम्मीद भरे दिल के साथ जब वो देश की सर्वोच्च अदालत में अपने हक की गुहार लगाने पहुंची, तब इस देश को नहीं पता था कि इस देश का भविष्य कैसे उस एक केस की वजह से बदल जाएगा।
वो कोई साधारण औरत नहीं थी, ना उसका केस कोई मामूली था। यह वो जंग थी जिसने हिंदुस्तान को झकझोर कर रख दिया। एक ऐसा फैसला आया जिसने राजीव गांधी की सरकार को घुटनों पर ला दिया और सच कहें तो इस फैसले के बाद जो कुछ हुआ उसके बाद तक आज तक कांग्रेस यूपी बिहार से गायब है। कांग्रेस को इस केस ने यूपी बिहार से मानो निस्तनाबूद कर दिया। राम मंदिर की राह को इसी केस ने खोल दिया। वो देश जहां इस्लाम खतरे में है, वहां से हिंदू खतरे में है तक, सब एक औरत की आवाज ने हिंदुस्तान को दो हिस्सों में बांट दिया। और 40 साल बाद अब एक बार फिर उस केस की चिंगारी फिर से सुलग रही है।
कौन दीलाएगा हक ?
7 नवंबर 2025 को एक फिल्म आने वाली है जिसका नाम है हक जहां गौतम इमरान हाशमी उस दौर को फिर से जिंदा करने जा रहे हैं। हमें लगा कि जब एक बार फिर से इस कहानी को दोहराया जा रहा है, तो क्यों न इस कहानी को हम आपको बताएं।
क्योंकि यह फिल्म सिर्फ अतीत की कहानी नहीं बल्कि आज के भारत के नक्श को भी टटोलती है, जहां पर यूनिफॉर्म सिविल कोड की गूंज एक बार फिर सुनाई पड़ेगी और फिर शाहबानों का संदर्भ उस फैसले के असर और उस तूफान का जिक्र होगा जिसने भारत को हमेशा हमेशा के लिए बदल दिया।
शाहबानों की कहानी को सुनना और समझना है। तो शुरू करते है शाहबानों के जन्म से
शाहबानों का जन्म साल 1916 को मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में हुआ। 16 साल की उम्र में उसकी शादी मोहम्मद अहमद खान से कर दी गई जो एक वकील थे। शाहबानों ने अपनी जिंदगी अपने पति और पांच बच्चों की परवरिश में गुजार दी।
लेकिन 1975 में 59 साल की उम्र में उनकी जिंदगी उस वक्त उजड़ गई जब उनके पति ने उन्हें तलाक दे दिया। मोहम्मद अहमद खान ने दूसरी शादी कर ली। शाहबानों को उनके घर से बेदखल कर दिया गया। पांच बच्चों की मां बिना किसी आर्थिक सहारे के सड़क पर आ गई थी।
उस दौर में मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाकशुदा महिलाओं को सिर्फ इद्दत की अवधि यानी 3 महीने तक का गुजारा भत्ता मिलता था। मोहम्मद अहमद खान ने शाहबानों को ₹200 महीने का गुजारा भत्ता देना शुरू किया। लेकिन साल 1978 में वह भी बंद कर दिया। शाहबानों, जो अब 62 साल की हो चुकी थीं, अपने और अपने बच्चों की जीविका के लिए कोई रास्ता न देखकर इंदौर की मजिस्ट्रेट कोर्ट में गुजारा भत्ता मांगने का केस दायर कर दिया। उन्होंने आपराधिक दंड संहिता सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अपने हक की मांग की जो हर पति को अपनी पत्नी और बच्चों को आर्थिक सहायता देने का आदेश देती है, चाहे वह किसी भी धर्म का हो।
यहीं से शाहबानों की लड़ाई शुरू होती है। शाहबानों केस इंदौर की निचली अदालत से शुरू हुआ और धीरे-धीरे ऊपरी अदालतों तक पहुंच गया। साल 1989 में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया और मोहम्मद अहमद खान को ₹25 महीने का गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। लेकिन यह राशि इतनी कम थी कि उससे शाहबानों गुजारा मुश्किल था।
इस फैसले को उन्होंने चुनौती दी और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने साल 1990 में गुजारा भत्ता बढ़ाकर लगभग ₹180 कर दिया। मोहम्मद अहमद खान ने इस फैसले को फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उनका तर्क था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाकशुदा पत्नी को सिर्फ इद्दत की अवधि तक गुजारा भत्ता मिलना चाहिए और उसके बाद पति की कोई जिम्मेदारी नहीं रहती।
अब यह मामला सिर्फ शाहबानों और उनके पति का नहीं था। यह धर्म, कानून और संविधान के टकराव का प्रतीक बन गया।
ऐतिहासिक फैसला – 23 अप्रैल 1985
23 अप्रैल 1985 को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश वाई बी चंद्रचूड़ ने की, उन्होंने शाहबानों के पक्ष फैसला सुना दिया।
कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 सभी भारतीय नागरिकों पर लागू होती है चाहे धर्म कोई भी हो। मुस्लिम पर्सनल लॉ को इस धारा के ऊपर प्राथमिकता नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने मोहम्मद अहमद खान को शाहबानों को ₹500 महीने का गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया।
इसके साथ ही कोर्ट ने टिप्पणी की कि यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की जरूरत है ताकि सभी धर्मों के लिए समान कानून बन सके।
यह फैसला न केवल शाहबानों के लिए जीत था बल्कि यह भारत के संविधान के समानता के सिद्धांत की भी जीत थी।
यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की जरूरत
लेकिन इस फैसले ने एक ऐसी आग को भी भड़का दिया जिसने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला होते ही देश में हंगामा मच गया। मुस्लिम कट्टरपंथी संगठनों और नेताओं ने इसे इस्लाम के खिलाफ करार दिया।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा कि यह फैसला शरियत में दखल देता है। देश भर में प्रदर्शन शुरू हो गए। इस्लाम खतरे में है का नारा गूंजने लगा। दूसरी तरफ हिंदू संगठनों ने इस फैसले को समानता की जीत के तौर पर देखना शुरू किया और इसे यूनिफॉर्म सिविल कोड की दिशा में पहला बड़ा कदम बताया।
राजनीतिक असर
उस समय देश में राजीव गांधी की सरकार थी, जिन्होंने 1984 के चुनाव में भारी बहुमत से जीत हासिल की थी। लेकिन शाहबानों केस ने उनकी सरकार को मुश्किल में डाल दिया। मुस्लिम समुदाय के बड़े वर्ग का गुस्सा और वोट बैंक खिसकने का डर कांग्रेस को सताने लगा।
राजीव गांधी ने इस दबाव में आकर एक ऐसा कदम उठाया जिसने उनकी सरकार और कांग्रेस की साख को हमेशा के लिए दागदार कर दिया।
साल 1986 में कांग्रेस सरकार ने संसद में मुस्लिम महिला अधिनियम पारित किया। इस कानून में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया गया और कहा गया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को सिर्फ इद्दत की अवधि तक ही गुजारा भत्ता मिलेगा।
इसके बाद उनकी जिम्मेदारी उनके परिवार या फिर वक्फ बोर्ड की होगी।
इस कानून को ही शाहबानों फैसले का उलटफेर माना गया।
निष्कर्ष
शाहबानो केस सिर्फ एक महिला की न्याय की लड़ाई नहीं था, बल्कि इसने भारतीय राजनीति, समाज और धर्मनिरपेक्षता की दिशा हमेशा के लिए बदल दी।

